yadi hota mein ek parinda

(Last Updated On: October 9, 2011)

यदि होता मैं एक परिंदा

यदि होता मैं एक परिंदा, दूर गगन में उड़ता
सूरज संग अठखेली करता, गीत खुशी के गाता
एक शाख से दूजे शाख पर, उछल कूद कर जाता
आपनी ही मन मर्ज़ी चलती, कोई नही भागता
यदि होता मैं एक परिंदा, दूर गगन में उड़ता

                                             आज़ाद गगन में मस्ती से जब, अपने पर फैलता
                                             मुक्त हूँ मैं, यही सोच कर भाग्य पर इठलाता
                                             यदि होता मैं एक परिंदा, दूर गगन में उड़ता

हाय रे मानव की कुदृष्टि, करे सर्वदा अग्नि की वृष्टि
मानव का लालायित मन, विनाशित करे संपूर्ण सृष्टि
यदि होता मैं एक परिंदा, दूर गगन में उड़ता

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