Feb 012016
 

मूक व्यथा

पुरषों को कहते हैं शासक,
हम कहते है उन्हें प्रताणक|
वास्तविक सत्य उलट है इसके,
जो कहा न जाये किसी से|

                               नारी ही प्रताड़ित होती,
                               समाज ये कहे सभी से|

पुरषों की मूक लाचारी का,
चहु ओर बने तमाशा|
पुरुष गर आवाज़ उठाए,
तो हाथ लगे उसके निराशा|

                               नारी ही प्रताड़ित होती
                               समाज ये कहे सभी से

पुरुष करे गर अत्याचार,
तो नारी मचाये हाहाकर|
नारी करे गर व्यभिचार,
तो वह है उसका सामाजिक अधिकार|

                               नारी ही प्रताड़ित होती,
                               समाज ये कहे सभी से|

नारी पुरुष समाज के हिस्से,
एक दूजे के बिना अधूरे किस्से|
न्यायिक व्यवस्था का सशख्त हाथ,
इनका बनाये समर्पित साथ|

                               नारी ही प्रताड़ित होती,
                               फिर समाज कहे ना किसी से|

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